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Thursday, February 23, 2012

चपल चन्चल चमकती दामिनी जब कड़कड़ाती है, तुम्हारी याद आती है





अरुण की लालिमा में जब गगन से ओस गिरती है
उजाले की किरण जब इस धरा पर पांव धरती है
हवा में हर दिशा जब मरमरी आभा बिखरती है
सरोवर में कमल कलिकायें जिस दम खिलखिलाती हैं
तुम्हारी याद आती है


यदि योगी तपस्वी साधु सिद्ध जब ध्यान करते हैं
गुरूद्वारे गुरूवाणी का जब गुणगान करते हैं
हरम पे चढ़ के बांगी जिस घड़ी अज़ान करते हैं
शिवाले में स्तुति की घंटियां जब घनघनाती हैं
तुम्हारी याद आती है


गली में जब मुरग़ की कुकड़ कूं आवाज़ आती है
निकल कर घोंसले से चिडि़या जिस दम चहचहाती है
मयुरी अपने पिव के संग जब ठुमका लगाती है
मधुर कंठी कोयलिया जब विरह के गीत गाती है
तुम्हारी याद आती है


घटा घनघोर चारों ओर जब अम्बर में घिरती है
नगाड़ों की तरह जब बदलियां गड़-गड़ गरज़ती हैं
रिदम के साथ जब रिमझिम झमाझम बूंदे गिरती हैं
चपल चन्चल चमकती दामिनी जब कड़कड़ाती है
तुम्हारी याद आती है


शबे-पूनम में पीला चॉंद जिस दम जगमगाता है
क्षितिज में एक नन्हा तारा ध्रुव जब मुस्कुराता है
सितारा शुक्र जब शफ्फ़ाक होकर चमचमाता है
गगन में जब कोई आकाश-गंगा झिलमिलाती है
तुम्हारी याद आती है



हास्यकवि अलबेला खत्री - सूरत


जय हिन्द !

Friday, February 10, 2012

एक गोरी सांवरी सी................


 
एक गोरी सांवरी सी मेरे गीतों की फ़ैन हो गई
एक छोरी बावरी सी मेरे गीतों की फ़ैन हो गई

पनघट जाती-जाती गाए
जल भर लाती-लाती गाए
आती गाए, जाती गाए
सखियों से बतियाती जाए
पल में सौ बल खाती जाए
गीत वो मेरे गाती जाए
कितनी बेचैन हो गई, कितनी बेचैन हो गई ...
रे मेरे गीतों की ....


उसकी छैल छबीली आँखें
चंचल आँखें , कटीली आँखें
बिजली सी चमकीली आँखें
मोटी-मोटी मछीली आँखें
नीली और नशीली आँखें
आबे-हया से गीली आँखें
तीर्थ उज्जैन हो गईं, तीर्थ उज्जैन हो गईं ...
रे मेरे गीतों की ...


जब जब मेरी याद सताये
उसकी मोहब्बत अश्क़ बहाये
तन घबराये, मन घबराये
उसका अखिल यौवन घबराये
जग-जग सारी रैन बिताये
पल दो पल भी नींद न आये
रातें कुनैन हो गईं, उसकी रातें कुनैन हो गईं
रे मेरे गीतों की ...



जय हिन्द !

Tuesday, February 7, 2012

जब कभी दुनिया में ख़ुद को तन्हा पाओगी प्रिये...........



आपके भी
ओंठ  इक दिन, गीत गायेंगे मेरे

नींद होगी आपकी पर,  ख़्वाब आयेंगे मेरे

आपके भी...


जागेगी जिस दम जवानी, जिस्म लेगा करवटें

रात भर तड़पोगी, बिस्तर पर पड़ेंगी सलवटें

आँखें होंगी आपकी पर

आँसू आयेंगे मेरे

आपके भी...



जब कभी दर्पण में देखोगी ये कुन्दन सा बदन

ख़ूब इतराओगी इस मासूमियत पर मन ही मन

मद तो होगा आप पे, पग

डगमगायेंगे मेरे

आपके भी...



राह चलते आपको गर लग गई ठोकर कभी

ख़ाक़ कर दूंगा जला कर, राह के पत्थर सभी

पांव होंगे आपके पर

घाव पायेंगे मेरे

आपके भी...



जब कभी दुनिया में ख़ुद को तन्हा पाओगी प्रिये

जब शबे-फुर्क़त  में दिल मचलेगी साथी के लिए

आप अपने आप को तब

पास पायेंगे मेरे

आपके भी...



हास्यकवि अलबेला खत्री अपनी मस्ती में मस्त...

जय हिन्द !

Monday, January 23, 2012

अन्धियारे के आँचल से सूरज निकलेगा





 सन्नाटे के सीने में तूफ़ान छुपा  है

 दर्दे-दिल में ख़ुशियों का सामान छुपा है


 अन्धियारे के आँचल से सूरज निकलेगा

काँटों के साये  में फिर से फूल खिलेगा

रात बहुत लम्बी है लेकिन कट ही जायेगी

फिर सुबह आएगी........

फिर सुबह आएगी........


अलबेला खत्री
दी ग्रेट इन्डियन लाफ्टर चैलेन्ज -२ के सेमी फायनल राउंड में परफ़ॉर्मेंस के बाद मस्ती के मूड में नाचते हुए बायें से दायें अली हसन,नवजोत सिद्धू,पेरिजाद कोला,स्मृति ईरानी, धार्शी, अलबेला खत्री, भगवंत मान, इरफ़ान मालिक और घुग्घी

 जय हिन्द !